पुरुष-स्त्री की शरीर-यात्रा का यथार्थ सच,, पुरुष का भयावह अंत,!स संपादक शिवाकांत पाठक,,!

 



पुरुष बूढ़ा होता है, और स्त्री परिपक्व। पुरुष बच्चों की शादी कर देता है, परिवार की आर्थिक स्थिति स्थिर कर देता है, तो परिवार में उसका वरिष्ठ और सम्मानित स्थान धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।इसके बाद, उसे बोझ समझा जाने लगता है — चिड़चिड़ा, गुस्सैल और अनिश्चित स्वभाव वाला बुजुर्ग, फालतू व्यक्ति। जिन कठोर निर्णयों को उसने कभी अपनी पत्नी और बच्चों के हित के लिए लिया था, अब उनकी ही आलोचना होती है. हर बात में उसे दोषी ठहराया जाता है।  उसने सच में जो गलतियाँ की हैं — उसके लिए तो भगवान ही उसकी रक्षा करें।

 लेकिन बुजुर्ग स्त्री को बच्चों और बहुओं से सहानुभूति मिलती रहती है — क्योंकि उससे अभी भी कई काम करवाने होते हैं। शिशुपापन, किचन, घर की रखवाली, नौकरानी की भूमिका आदि.,! सही समय आने पर वह भी चतुराई से पति के शिविर से बच्चों के शिविर में चली जाती है।

 पतिपरमेश्वर की पत्नीश्री बहू का साथ इसलिए भी पकड़ लेती है ताकि बेटा उससे दूर न हो जाए. उसकी देखभाल करता रहे। पति तो ऐसे किसी काम का रहा नहीं. 

चाहे किसी पुरुष की जवानी में कितनी भी बड़ी उपलब्धियाँ रही हों, बुज़ुर्गावस्था में उसका कोई फायदा नहीं होता। शास्त्र और परम्परा में माँ का महिमामंडन है, बाप का नहीं. संतान इस कारण भी माँ को महत्व देती है. इसलिए बुजुर्ग पुरुष यथार्थत: जहाँ तन्हा, निरूपाय रहता है, वहीं बुजुर्ग स्त्री अपने "कथित पिछले पुण्यों के ब्याज पर" जीवन का आनंद लेती रहती है।जिनके पास नकद संपत्ति या जमीन होती है उनका हाल कुछ बेहतर होता है। बाकी का अंजाम स्पस्ट है।किसी भी अस्पताल में जाइए — आप सिर्फ रिश्तेदारों की आँखें देखकर पहचान सकते हैं कि मरीज बूढ़ा पुरुष है या बूढ़ी महिला।

_अगर मरीज बुजुर्ग पुरुष है, तो "बेटी को छोड़कर" किसी की आँखों में आँसू नहीं होंगे।_

प्राचीन शास्त्रों तक में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि किसी स्त्री ने वानप्रस्थ, संन्यास या समाधि ग्रहण किया हो। ये केवल पुरुषों के लिए निर्धारित थे। उनका महत्व समझिए — तब आप जान पाएँगे कि हमारे पूर्वज कितने दूरदर्शी थे।

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