आत्मसमर्पण के बाद हत्या दुःखद पहलू,,ईश्वर का न्याय अद्भुत है इससे समझना बेहद कठिन है,,!स संपादक शिवाकांत पाठक,!
भरत तिवारी हो या क़ोई भी पुरुष,, यदि कानून का सम्मान करते हुए अपने हाँथो में लिए गये हथियार को फेंक कर समर्पण करता है तो यह स्पष्ट है कि वह व्यक्ति कानून और संबिधान का सम्मान करता है,, लेकिन इसके वावजूद उसे कानून को हाँथ में लेते हुए न्यायलय, संबिधान, को ताक में रखकर मृत्यु दंड दिया जाये तो यह कृत्य बेहद अमनवीय सिद्ध होता है,, जिसकी जितनी भी आलोचना की जाये वह कम है,, राजा दसरथ ने भूल वस ही तो श्रवण कुमार को मारा था परिणाम क्या हुआ आप जानते है,, यह कर्म भूमि है जो बोया है उसे ही काटना होगा,,, यह घटना फिरंगियों के शासन की यादों को तरोताजा करती है,, ऐसे में अन्याय या अधर्म के विरुद्ध बोलने का परिणाम आम जन मानस में गलत सन्देश देता है,, हनुमान ने अशोक वाटिका में मेघनाथ के सामने आत्मसमर्पण किया था, जबकि मेघनाथ राक्षस था परन्तु उसने भी हनुमान को सुरक्षित ले जाकर दरबार में पेस किया,, विभीषण ने भी राम के समक्ष समर्पण किया था तो क्या उसे मार दिया गया,,? नहीं,, तो फिर यहाँ बात इंसाफ की है,, राजनीति की नहीं,, बाकी इतिहास उठा कर देखो, अनीति पर चलने वालों का क्या हश्र हुआ,, दु...