प्रकृति की पाठशाला से : निस्वार्थ सीखो, अपेक्षा मत करो,,!
स संपादक शिवकांत पाठक प्रकृति ही मानव की सर्वश्रेष्ठ गुरु है। इससे शिक्षा लेना चाहिए। मनुष्य का जन्म तमाम योनियों में भटकने के बाद प्राप्त होता है, ताकि हम परमात्मा से एकीकार कर सकें। खाना, सोना, चलना-फिरना ये सब तो तमाम जीव करते हैं। लेकिन मनुष्य को ईश्वर ने दो चीजें अतिरिक्त दी हैं - विवेक और बुद्धि। इन्हीं दो गुणों के कारण मनुष्य को "सर्वश्रेष्ठ प्राणी" कहा गया। पर विडंबना देखिए, इन्हीं गुणों के होते हुए भी मनुष्य माया-मोह के वश में रहकर तरह-तरह के दुख भोगता है। एक दिन मैंने अपने घर की खिड़की पर देखा। एक चिड़िया ने बहुत मेहनत से तिनका-तिनका जोड़कर घोंसला बनाया था। उसमें उसके 3 नन्हे बच्चे थे। सुबह से शाम तक वो चिड़िया चोंच में अन्न के दाने लाती और बच्चों के मुंह में डालती। न धूप की परवाह, न भूख-प्यास की। बस एक ही धुन - बच्चों को बड़ा करना। धीरे-धीरे दिन बीते। बच्चे बड़े हुए। उनके पर निकले। एक दिन वो चिड़िया उन्हें उड़ना सिखाने लगी। गिरे, संभले, फिर उड़े। और जिस दिन वो अच्छे से उड़ने लगे, उस दिन के बाद वो कभी घोंसले में वापस नहीं आए। घोंसला खाली रह गया। चिड़िया ने न ...