युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता!स संपादक शिवाकांत पाठक,!
युद्ध के पीछे हमेसा कारण होते हैं आकरण युद्ध,, हठधर्मिता कहलाता है,सिर्फ कौतूहाल निर्वित्त के लिए युद्ध जैसी विनाश लीला के घातक परिणाम होते है,, महाभारत हो या राम रावण युद्ध इनके पीछे विशेष कारण थे और युद्ध ही अंतिम विकल्प था जबकि इस समय पर युद्ध सिर्फ शक्ति प्रदर्शन का उदाहरण बना हुआ है,,
माया पाय केहि मद नाहीं अर्थात ऐसा क़ोई नहीं है जिसके पास धन, ताकत और बुद्धि अधिक होने पर उसे अभिमान न हो कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है इसराइल और ईरान में यदि युद्ध का माहौल था तो बुद्धिमान देशो को चाहिए की उन्हें कूटनीति द्वारा समझौते की ओर लें जाए न कि अमेरिका की तरह पूछ खड़ी करके खुद भी युद्ध का डंका पीटने लगें, जैसे कुछ बच्चे शैतानी अधिक करते है बस वही क़ाम अमेरिका ने किया उससे पूछो कि क्या ईरान ने तुमको युद्ध की चुनौती दी थी या फिर इजराइल ने मदद के लिए कहा था तो जबाब में नहीं ही उत्तर होगा,, तो फिर अचानक बेचैनी का कारण क्या है,, यदि तुम्हारी गिनती संपन्न देशो में की जाती है तो फिर तुम्हे तो ऐसी वेवकूफी नहीं करना चाहिए कि कल सारी दुनियां हँसे,,क्यों कि फालदार वृक्ष हमेसा झुका होता है नम्र हो जाता है और अभिमान सदैव विनाश का कारण बनता है,,सभी देशो को मिलकर उन देशो के बीच शांति स्थापना का प्रयास करना चाहिए जिसमें शांति स्थापना, संघर्ष समाधान शामिल हों ।
शांति का इतिहास उतना ही पुराना है जितना स्वयं मानव जाति का इतिहास, और निश्चित रूप से युद्ध जितना ही पुराना है। अक्सर यह माना जाता है कि युद्ध मानव जाति की स्वाभाविक अवस्था है, और किसी भी प्रकार की शांति नाजुक और क्षणभंगुर होती है।

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