मिठाई बाटने से पहले उन क्रन्तिकारी शहीदों की शहादत को भी नमन करना चाहिए,!
स संपादक शिवाकांत पाठक,
आज कितना सुहावना दिन है स्वतंत्रता दिवस,, जगह जगह ध्वजा रोहण, मिष्ठान वितरण, सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आप देख रहे होंगे लेकिन क्या आपने एक पल सोचा कि आजादी कैसे और किनके कारण मिली,,? नहीं क्यों की मतलबी दुनियां में प्राणो की आहुति क़ोई और देता है, मलाई क़ोई और मारता है,, एक मिनट का मौन रख कर क्या आप या देश के जिम्मेदारो ने उन अमर शहीदों की सहादत को नमन किया जिन्होंने हँसते हँसते फ़ासी के फंदे को चूम कर वन्देमातरम कहा,, क्या ऐसी राष्ट्र भक्ति आपको आज किसी में दिख रही है,, गौर करें 🙏👇
कुछ याद उन्हें भी कर लो जो लौट के घर न आये 👇
शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने 23 साल की उम्र में ही मां भारती की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी. उनके इस जज्बे को देखकर देश के युवाओं को भी देश की आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा मिली. आज भी युवा उनके आदर्श और हिम्मत से सीख लेते हैं. आज भी घर-घर में भगत सिंह की देशभक्ति के किस्से सुनाए जाते हैं. इस दिन (23 मार्च) भगत सिंह के साथ सुखदेव और शिवराम राजगुरु ने भी भारत की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया. इन तीनों लोगों की शहादत को याद करने के लिए हर साल 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है. भगत सिंह के देश के प्रति प्रेम के जज्बे को देखकर देश के युवाओं को भी देश की आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा मिली. भगत सिंह ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्हें देखते हुए कई लोगों ने क्रांतिकारी मार्ग को अपनाया.


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