ये है लोकतंत्र का असली स्वरूप! 20 रुपये घूस लेने के जुर्म मे 30 साल रहा जेल मे,,!

 



संपादक शिवाकांत पाठक,,



 कोर्ट ने माना बेगुनाह तो अगले दिन ही ईश्वर के हो गए प्यारे,,!

लोकतंत्र के चार मुख्य स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया (प्रेस) हैं। ये मिलकर शासन को सुचारू, पारदर्शी और जिम्मेदार बनाते हैं। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उसे लागू करती है, न्यायपालिका न्याय और संविधान की रक्षा करती है, और मीडिया जनमत को आकार देकर सरकार पर नजर रखती है।

लेकिन विधायिका कानून बनाती है यह हमारे भारतीय संबिधान की ठोस पहल है,, जहाँ चपरासी की भर्ती के लिए कक्षा 12 की मार्कसीट चाहिए,, और जिन्हे कानून बनाने जैसा प्रमुख कार्य सौंपा जाये उनके लिए शिक्षा अनिवार्य ही नहीं है,, और जहाँ शिक्षा नहीं वहां से निर्मित कानून कितने उज्वल और पवित्र होंगे यह सोचने की जरुरत ही नहीं,,साथ ही बात करते है पत्रकारिता की तो मिडिया जनमत को आकार देकर सरकार पर नजर रखने की बात हमारे संबिधान में निहित है लेकिन वर्तमान में सच क्या यह बताने की जरूरत ही नहीं,, क्यों सरकार को देखने की जुर्रत अब मिडिया मे दूर तक नहीं दिखती,, जनता कि समस्याओ या जनमत से मिडिया का दूर तक क़ोई रिस्ता नहीं है,, सच्चाई क्या है यह लिखने की जरुरत नहीं है,,


बाबूभाई प्रजापति अहमदाबाद में पुलिस कांस्टेबल के पद पर तैनात थे. उन पर आरोप लगा कि उन्होंने शहर में ट्रकों को अवैध रूप से एंट्री करवाने के लिए कथित तौर पर 20 रुपये की रिश्वत ली है. इस मामले में 30 साल तक उनपर केस चलता रहा और जब कोर्ट ने उनकी बेगुनाही पर मुहर लगाई तो अगले ही दिन उनकी मौत हो गई.



सोचिये एक शख्स ने अपनी जिंदगी के 30 बेशकीमती साल जेल और अदालतों के चक्कर में गुजार दिए और जब आखिरकार उसकी बेगुनाही पर मुहर लगी तो वह खुशी ज्यादा देर तक जिंदगी का हिस्सा नहीं बन सकी. यह कहानी है गुजरात के बाबूभाई प्रजापति की. एक साधारण पुलिस कांस्टेबल, जिन पर 30 साल पहले महज 20 रुपये रिश्वत लेने का आरोप लगा था. तीन दशक तक वह एक ‘भ्रष्ट’ के दाग के साथ जीते रहे. 4 फरवरी को गुजरात हाईकोर्ट ने उन्हें पूरी तरह निर्दोष करार दिया. अदालत ने साफ कहा कि गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं और अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा.

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