आपके अंदर स्थिति ईश्वर,,,मौन की भाषा समझता है,, मौन होकर एक कह कर देखो,,!

 


स संपादक शिवाकांत पाठक,,


( जिस ईश्वर ने सारे संसार को बनाया उसकी प्रतिमा,, मूर्ति बना कर इन्शान खुद को ईश्वर का निर्माता समझ बैठा )




बुद्ध के पास एक आदमी आया। उसने कहा. जो नहीं कहा जा सकता, वही सुनने आया हूं। बुद्ध ने आंखें बंद कर लीं। बुद्ध को आंखें बंद किये देख वह आदमी भी आंख बंद करके बैठ गया। 


आनंद बुद्ध का सेवक पास ही बैठा था —वह सजग हो गया कि मामला क्या है? सोचा झपकी खा रहा होगा, बैठा—बैठा करेगा क्या,,? जम्हाई ले रहा होगा। देखा कि मामला क्या है? इस आदमी ने कहा, जो नहीं कहा जा सकता वही सुनने आया हूं। और बुद्ध आंख बंद करके चुप भी हो गये और यह भी आंख बंद करके बैठ गया। दोनों किसी मस्ती में खो गये। कहीं दूर… शून्य में दोनों का जैसे मिलन होने लगा। आनंद देख रहा है, कुछ हो जरूर रहा है; मगर शब्द नहीं कहे जा रहे है—न इधर से न उधर से। न ओंठ से बन रहे हैं शब्द, न कान तक जा रहे हैं शब्द; मगर कुछ हो जरूर रहा है! कुछ अदृश्य उपस्थिति उसे अनुभव हुई। जैसे किसी एक ही आभामंडल में दोनों डूब गये। यह घटना सत्य है,, कुछ देर बाद वह आदमी उठा उसकी आँखो से आंशू बह रहे थे,, उसने बुद्ध के पैर छुए और कहा कि मुझे जबाब मिल गया,,अब बुद्ध का सेवक आश्चर्य में पड़ गया न कोई बात हुई ना ही कोई जबाब मिला और यह संतुष्ट होकर जा रहा है,,



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