आज भी दहेज़ की बलिवेदी पर क्यों भेंट चढ़ रहीं हैं बेटियां,,?

 


स संपादक शिवाकांत पाठक,,


नोएडा की दीपिका, भोपाल की त्विषा, कर्नाटक की ऐश्वर्या, जयपुर की अनु। ये वे नाम हैं जिन्होंने विवाह के कुछ समय बाद ही ससुराल में अपनी जानें गवां दीं। हालांकि, दोनों पक्ष की तरफ से आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है, पर पीड़ित परिवार का दावा है कि दहेज के नाम पर दबाव डाला गया था।



वास्तव में रोजाना सामने आती हैं ऐसी दिल दहलाने वाली घटनाएं (Dowry Deaths in India)। इनमें कुछ अखबारों, मीडिया की सुर्खियां बनती हैं। इंटरनेट मीडिया पर हैशटैग के हवाले से लड़कियों को न्याय दिलाने की गुहार लगाई जाती है। पूरा माहौल तंज-गुस्सा-नाराजगी से गर्म हो उठता है और फिर से सुलगने लगते हैं वही सवाल कि आखिर कब तक सामाजिक प्रतिष्ठा व झूठे मानदंडों पर खरा उतरने की जिद के आगे दम तोड़ती रहेंगी बेटियां? 


हाल ही में आई एनसीआरबी के आंकड़े भी कह रहे हैं कि यह समस्या कितनी विकराल है। महज कानून के बल पर दहेज रूपी दानव को खत्म करने की बात बेमानी सी हो गई है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) के द्वारा जारी नए आंकड़ों के मुताबिक, भारत में वर्ष 2024 के दौरान दहेज हत्या के 5,737 मामले दर्ज किए गए। हर दिन दहेज के नाम पर औसतन 16 महिलाओं की जानें जा रही हैं।

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