फर्जी पत्रकारिता पर मौन भंग करने हेतु डी एम को सौंपा ज्ञापन,,!हरिद्वार,,!
स संपादक शिवाकांत पाठक,
( जिला सूचना विभाग अपनी जिम्मेदारी तय करे यही बेहतर होगा ,)
खुद को पत्रकार कहने वालों की संख्या रक्तबीज की तरह बढ़ रही है जबकि न उनके पास मान्यता प्राप्त या आर एन आई स्वीकृति प्रेस आईडी होती है, न कोई प्रामाणित संगठन से जुड़ाव वैसे प्रमाणित संगठन से जुड़ाव मात्र पत्रकारिता का ठोस आधार नहीं हो सकता। हालांकि शहर और गांवों में इन “कथित पत्रकारों” की पहुंच इतनी बढ़ चुकी है कि सरकारी अस्पताल, ब्लॉक, स्कूल टैक्सियों और पार्किंग स्थलों बाजार, दुकानों और गैस एजेंसियों हर जगह वे अपने ‘प्रेस’ टैग के नाम पर दबाव बनाते और विवाद खड़े करते पाए जा रहे हैं ।सूत्रों के मुताबिक कई लोग मामूली वेब पोर्टल तैयार कर उसके नाम से मिलते-जुलते लोगो बनवाकर नेशनल-रीजनल चैनलों जैसा माहौल खड़ा कर देते हैं। कई पोर्टलों में खबरें प्रकाशित ही नहीं होतीं, लेकिन माइक आईडी और ‘प्रेस’ स्टिकर लेकर वे वी आई पी कवरेज में सबसे आगे जगह घेर लेते हैं।साथ ही ऐसा भी सुनने मे आया है कि अवैध कारोबारियों से उनके अच्छे तालमेल तब तक रहते हैँ जब तक उन तक सहायता राशि पहुँचती है,,जबकि पत्रकारिता अवैध कार्यों का पर्दा फास करने हेतु निर्भीकता पूर्ण दायित्व का पालन करने का सन्देश देती है,,
पुलिस प्रशासन भी परेशान सत्यापन के आदेश मिलते ही होगी सख्त कार्रवाई। एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि प्रेस लिखे वाहनों और कार्ड लिए घूमने वालों की संख्या इतनी ज्यादा है कि असली-नकली की पहचान ही चुनौती बन गई है। जैसे ही जिला प्रशासन से आदेश आएंगे, सूचना विभाग की अधिकृत सूची के आधार पर सख्त जांच की जाएगी और कथित पत्रकारों पर कार्रवाई होगी।मिली जानकारी के अनुसार कई कथित पत्रकार तो ऐसे मामलों में भी सबसे पहले पहुंच जाते हैं जहाँ उन्हें केवल प्रभाव दिखाना होता है न कि खबर बनानी।
( वरिष्ठ नहीं अनुभवी पत्रकारो को चिंतित होना लाजिमी,, ‘पत्रकारिता की साख पर पड़ रहा दाग’ )
शहर के वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि फर्जी पत्रकारों की इस बाढ़ ने न सिर्फ पत्रकारिता की गरिमा को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि समाज में पत्रकारों के प्रति गलत धारणा भी पैदा की है।वे कहते हैं कि प्रेस क्लब और सक्रिय संगठनों में वास्तविक, अनुभवी पत्रकार मौजूद हैं, लेकिन उनकी पहचान इन कथित पत्रकारों के शोर में दब जाती है।
शांतिकुंज कार्यक्रम में हुई अव्यवस्था ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि हरिद्वार में पत्रकारों के सत्यापन की प्रक्रिया अब अत्यंत आवश्यक हो चुकी है।जिलाधिकारी द्वारा SOP बनाने का आश्वासन वास्तविक पत्रकारों में उम्मीद जगाता है, लेकिन जिले में फैले फर्जी प्रेस कार्ड, वेब पोर्टल और कथित रिपोर्टरों पर रोक लगने के लिए अब ठोस कार्रवाई की जरूरत है।

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