गुरु-शिष्य परम्परा में ही किसी शिष्य का विकास हो सकता है। सचिन त्यागी,,!
संपादक शिवाकांत पाठक,,
उसमें कुछ अनुभवी आंखें, उसकी योग्यता/क्षमता/गुणवत्ता को पहचान कर उसे निखारने की कला रखती हैं। अन्यथा मैकाले की शिक्षा पद्धति तो रेडिमेड नौकरशाह तैयार कर सकती है जिसमें व्यक्ति की शक्ति/क्षमता/गुणवत्ता के नाश के साथ-साथ उसकी आत्मा तक को कुचल-मसल दिया जाता है। ध्यान रहे कि प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में एक विलक्षण प्रतिभा का धनी है और वह उसी में निखर सकता है। कौआ भी अपनी प्रकृति में जीवन्त हो सकता है लेकिन मोरपंख लगाकर, उसे मोर नहीं बना सकते। यदि हम ऐसा कोई प्रयास करेंगे तो वह मोर तो कभी बन नहीं पायेगा, कौआ भी बने रहने से वंचित रह जायेगा। अभी हाल ही में एक परिवार ने, अपने पढ़ाई में औसत बच्चे को आईएएस बनाने की सनक में, साधारण कामगार/क्लर्क तक बनने की उसकी क्षमता छीन ली। आईएएस वह बन नहीं पाया और छोटे पद को हीनता से देखते हुए ऐसा समझें कि 'न घर का रहा न घाट का'। हमें पालते हुए अपने बच्चे की समस्त क्षमताओं का ध्यान रखते हुए ही उसका उत्साह बढ़ाना चाहिए। यही काम कभी हमारे गुरूकुलों में होता था। यदि हम गुणों के पारखी नहीं हैं तो अपनी अधूरी इच्छाओं की पूर्ति हेतु अपने मासूम बच्चों की बलि तो न चढ़ाएं।

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