पत्रकारों के लिए खतरे की घंटी साबित हुआ वर्ष 2025,,!स संपादक शिवाकांत पाठक,,!
आपने देखा होगा जब तक बच्चा रोता नहीं है तब तक उसे उसको जन्म देने वाली माँ भी दूध नहीं पिलाती यही बात पत्रकारों पर सार्थक साबित होती है, जिसने कभी भी आरक्षण,, या सुविधाओं, वेतन, भत्ता आदि को लेकर आवाज नहीं उठाई,, परिणाम यह हुआ की सरकार ने अभी हाल ही में पत्रकारों को लेवर कैटागिरी में डाल दिया,, वैसे यह कार्य बेहद ऐतिहासिक और सराहनीय था, वैसे तो पत्रकारिता बुद्धिजीवियों से जोड़ कर देखी जाती रही है लेकिन विदेशी उपलब्धि सोशल मिडिया ने सभी को बुद्धजीवी घोषित कर दिया,, पत्रकारिता एक आम बात हो गई और सिस्टम मौन हो गया बस तभी से प्रारम्भ हुआ पत्रकारिता का चीरहरण,, धृतराष्ट्र की आँखों में तो पट्टी बँधी थी,, लेकिन बाकी सब मौन रहे यह चिंता का विषय है,, न आर एन आई, न अंकन, न भारत सरकार की सूचना प्रणाली की क़ोई बंदिसे,, एफ बी, यू ट्यूब जिसका निर्माण ही विदेश में हुआ उसके आगे आज भारतीय सिस्टम भी सोचने के लिए मजबूर दिख रहा है,, तो फिर पत्रकार के हितो की आवाज कौन उठाएगा यह एक बड़ा सवाल है,, यदि गंभीरता पूर्वक विचार किया जाये तो सत्य यही है कि चाटुकारिता का जन्म ही सोसल मिडिया से हुआ है,,...