आखिर ये कैसा लोकतंत्र,,?

 


जहाँ पड़ी बेड़िया पैरो में हर जगह टेक्स की आजादी,,

पिसता तो  है केवल   गरीब,, पूंजी पतियों की है चांदी,,

नेता कहलाते अरबपति,, 

लेकिन जब संकट आता है,,

तब राष्ट्रस्तर पर भी चंदा,,

जनता से माँगा जाता है,,

जनता देती है वोट उन्हें,,

लेकिन जनता की सुने कौन,,

दर दर भटका था सुखविंदर,,

फिर भी सिस्टम क्यों रहा मौन,,?

 है वही गुलामी की फितरत,,

कैसे कह दें हम हैँ स्वतंत्र,,?


आखिर ये कैसा लोकतंत्र,,?

आखिर ये कैसा लोकतंत्र,,?


नारी शक्ति की बात करें,,

 तो छा जाता है सन्नाटा,,

जो गिरे स्वयं मानवता से,,

उनके मुँह पर पड़ता चाटाँ,,

जब गुनहगार होकर खुद ही कानून निगलता जाता है,,

और सत्ता के मद में आकर,,

खुद शहंशाह बन जाता है,,

तब सत्य धरा पर बना रहे,,

 अवतार उसी क्षण आता है,

 होती है तभी महाभारत,,

ईश्वर नायक कहलाता है,,

धृतराष्ट्र मौन हो जाते हैँ,, 

चलता ना क़ोई तंत्रमंत्र,,

 इतिहास तभी चिल्लाता है 

आखिर ये कैसा लोकतंत्र,,?


अभिव्यक्ति की आजादी के तहत स्व रचित मौलिक रचना,,

स संपादक शिवाकांत पाठक 

दैनिक विचार सूचक समाचार पत्र,, सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त,,

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