हाँ, समय के साथ कानून में बदलाव ज़रूरी है क्योंकि समाज, तकनीक, अर्थव्यवस्था और नैतिकता बदलती है,,!

 




युग बदलता है, समय चक्र बदलता है, रहन सहन और व्यवहार बदलता है,, सोच बदलती है,, अपराधों के नये ढांचा तैयार होते है,, फिर कानून में बदलाव क्यों नहीं,,,?

विकास की आंधी में अपराध करने के तरीको को जन्म दिया टी वी में सीरियल आये,, अपराध के नये तौर तरीके आये नई पीढ़ी के लिए अमर्यादित संस्कारो का उदय हुआ लेकिन हम पुराने घिसे  पिटे सिस्टम से देश की उन्नति और विकास की उम्मीद करते रहे,,क्या आप जानते हैं कि यदि क़ोई ड्राइवर अपनी गाड़ी से किसी को कुचल कर मार डाले तो तो ज़मानत मे समय नहीं लगता ये अंग्रेजी एक्ट आज भी भारत में लापरवाही की ढाल बना हुआ है,, अवैध शराब के लिए दफा 60 आज शराब तस्करी के लिए वरदान साबित हो रही है,, दूर दराज से आये शराब तस्कर आज धर्म नगरी मे मौज ले रहे है,, यह सब हमारे देश का दुर्भाग्य है, इसे हम सौभाग्य कैसे कह सकते हैँ,, तस्करो द्वारा बिकवाई जा रही शराब पकड़े जाने पर,, बेचने वाला पकड़ा जाता है माफिया नहीं,, माफिया तो लम्बा टीका माथे पर लगा कर शुक्राचार्य बन जाता है,,


 जिससे पुराने कानून अप्रासंगिक हो जाते हैं; कानून को सामाजिक मूल्यों के अनुरूप ढलना, नई चुनौतियों (जैसे साइबर सुरक्षा) का समाधान करना और न्याय सुनिश्चित करना होता है, इसलिए समय-समय पर कानूनों की समीक्षा और संशोधन आवश्यक है ताकि वे प्रभावी और प्रासंगिक बने रहें. 


( कानून में बदलाव की आवश्यकता क्यों है,,,?,,)



    समाज की सोच, मान्यताएँ और ज़रूरतें बदलती हैं (जैसे महिलाओं के अधिकार, LGBTQ+ अधिकार), और कानून को इन परिवर्तनों को दर्शाना होता है.   नई तकनीकें (ए आई डेटा प्राइवेसी) नए कानूनी सवाल खड़े करती हैं, जिनके लिए नए कानूनों या संशोधनों की ज़रूरत होती है.

  जो व्यवहार पहले स्वीकार्य था (जैसे सती प्रथा, बाल विवाह), वह अब अनैतिक माना जाता है, और कानून इसे प्रतिबंधित करता है.    वैश्वीकरण के कारण अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और मानकों को पूरा करने के लिए कानूनों में बदलाव होता है.   महामारी या प्राकृतिक आपदाएँ मौजूदा कानूनों की कमज़ोरियों को उजागर करती हैं, जिससे सुधार की ज़रूरत पड़ती है समय के साथ पता चलता है कि कानून में क्या कमियाँ या कमियाँ हैं, और उन्हें ठीक करने के लिए संशोधन किए जाते हैं.  भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को खत्म करता है, कानून के ज़रिए सामाजिक बदलाव का एक सफल उदाहरण है.

नशा   सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान या किसी भी नशे पर प्रतिबंध जैसे कानून स्वास्थ्य जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन में सहायक हुए हैं. 

संक्षेप में, कानून एक जीवित व्यवस्था है जिसे समाज के साथ विकसित होना चाहिए ताकि यह प्रासंगिक, न्यायपूर्ण और प्रभावी बना रहे, इसलिए समय के साथ इसमें परिवर्तन आवश्यक है.

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