भारत में विकास के नाम पर मंदिरों का ध्वस्तीकरण: क्या यह न्यायसंगत है ?
🇮🇳भारत एक प्राचीन सभ्यता और विविध आस्थाओं का देश है, जहाँ मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं, बल्कि संस्कृति, कला, इतिहास और सामुदायिक जीवन के केंद्र रहे हैं। सड़कों का चौड़ीकरण, मेट्रो परियोजनाएँ, रेलवे कॉरिडोर, स्मार्ट सिटी योजनाएँ और अन्य आधारभूत संरचना विकास के लिए भूमि अधिग्रहण होता है, और कभी-कभी धार्मिक ढाँचों पर भी असर पड़ता है। ऐसे में अक्सर यह प्रश्न उठता है—क्या विकास के नाम पर केवल हिंदू मंदिर ही तोड़े जा रहे हैं? क्या यह न्यायसंगत है? इस संवेदनशील विषय को तथ्यों, कानून और व्यापक परिप्रेक्ष्य के साथ समझना आवश्यक है।
*✴️विकास बनाम विरासत: टकराव की पृष्ठभूमि*
भारत के अनेक शहरों का विकास अनियोजित ढंग से हुआ है। दशकों में सड़कों के किनारे, सरकारी भूमि या अतिक्रमित भूभाग पर छोटे-बड़े धार्मिक ढाँचे खड़े हो गए। जब सरकारें सार्वजनिक हित में परियोजनाएँ शुरू करती हैं, तो ऐसे निर्माण प्रभावित होते हैं। यह भी सच है कि जनसंख्या के अनुपात और भौगोलिक फैलाव के कारण देश में हिंदू मंदिरों की संख्या अधिक है, इसलिए आँकड़ों में मंदिरों का प्रभावित होना अधिक दिख सकता है। लेकिन केवल “संख्या अधिक दिखना” और “केवल एक ही समुदाय को निशाना बनाना”—इन दोनों में फर्क समझना होगा।
*⚖️कानूनी ढाँचा क्या कहता है?*
🔸सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण: यदि कोई भी धार्मिक ढाँचा—मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारा—सरकारी भूमि पर बिना अनुमति बना है, तो कानूनन उसे हटाया जा सकता है।
🔸न्यायालयों के निर्देश: उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर राज्यों को निर्देश दिए हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर अवैध धार्मिक निर्माण रोके जाएँ।
🔸पुरातात्विक संरक्षण: जिन धार्मिक स्थलों का ऐतिहासिक या पुरातात्विक महत्व है, उन्हें संरक्षित स्मारक का दर्जा मिलता है और उन्हें मनमाने ढंग से नहीं तोड़ा जा सकता।
⚖️कानून का सिद्धांत स्पष्ट है—राज्य की कार्रवाई धर्मनिरपेक्ष होनी चाहिए और सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
*✴️फिर विवाद क्यों उठता है?*
🔹धार्मिक संवेदनशीलता: मंदिरों के साथ लोगों की गहरी भावनाएँ जुड़ी होती हैं। जब कोई मंदिर हटाया जाता है, तो उसे आस्था पर आघात के रूप में देखा जाता है।
🔹 पारदर्शिता की कमी: यदि प्रशासन पर्याप्त संवाद, नोटिस, पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था के बिना कार्रवाई करे, तो अविश्वास बढ़ता है।
🔹 चयनात्मकता का आरोप: कुछ मामलों में यह धारणा बनती है कि कार्रवाई समान रूप से नहीं हो रही। यदि एक क्षेत्र में केवल मंदिर हटते दिखें और अन्य ढाँचे न हटें, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
*🔺क्या केवल मंदिर ही तोड़े जाते हैं?*
विभिन्न राज्यों में विकास परियोजनाओं के दौरान अलग-अलग धर्मों के ढाँचे प्रभावित हुए हैं। कई शहरों में मस्जिदें, दरगाहें, चर्च और गुरुद्वारे भी सड़क या मेट्रो विस्तार के कारण स्थानांतरित या ध्वस्त किए गए। हालाँकि, स्थानीय स्तर पर परिस्थितियाँ भिन्न हो सकती हैं। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पूरे देश का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं हर मामले को उसके तथ्य और कानूनी स्थिति के आधार पर देखना चाहिए।
*⚖️न्यायसंगत क्या है?*
✴️ समानता का सिद्धांत: यदि कोई निर्माण अवैध है, तो धर्म की परवाह किए बिना समान नियम लागू हों।
✴️ संवाद और पुनर्स्थापन: धार्मिक स्थल हटाने से पहले समुदाय से चर्चा, वैकल्पिक भूमि या स्थानांतरण की व्यवस्था हो।
✴️ विरासत का सम्मान: प्राचीन और सांस्कृतिक महत्व वाले मंदिरों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो विकास योजनाएँ उनके अनुरूप डिज़ाइन की जाएँ।
✴️पारदर्शिता: प्रशासन स्पष्ट रूप से बताए कि कौन-सा ढाँचा क्यों हटाया जा रहा है—अवैधता, सुरक्षा, या सार्वजनिक हित के कारण।
*💠समाज के लिए संदेश*
विकास और विरासत दोनों राष्ट्र की संपत्ति हैं। एक ओर बेहतर सड़कें, परिवहन और सुविधाएँ नागरिक जीवन को आसान बनाती हैं तो दूसरी ओर मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल हमारी पहचान और सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक हैं। समाधान टकराव में नहीं, संतुलन में है। यदि कहीं चयनात्मकता या अन्याय हो रहा है, तो लोकतांत्रिक और कानूनी माध्यमों से आवाज उठाना चाहिए। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि धार्मिक आस्था के नाम पर सार्वजनिक भूमि पर अनियंत्रित निर्माण न हो, ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियाँ पैदा ही न हों।
*🚩निष्कर्ष*
“क्या विकास के नाम पर केवल हिंदू मंदिर ही तोड़े जाते हैं?”—यह प्रश्न भावनात्मक है और हर मामले में अलग-अलग उत्तर हो सकता है। परंतु सिद्धांत स्पष्ट है कानून सबके लिए समान होना चाहिए, और विकास की योजना ऐसी हो जो सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करते हुए आगे बढ़े। आँखें खोलने वाली बात यह है कि असली मुद्दा “मंदिर बनाम विकास” नहीं, बल्कि “न्यायपूर्ण और पारदर्शी प्रशासन” है। जब तक समानता, संवाद और संवेदनशीलता नहीं होगी, तब तक किसी भी समुदाय को अन्याय का अनुभव हो सकता है। इसलिए आवश्यक है—विकास भी हो, और विरासत भी सुरक्षित रहे।

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