प्रेम का अनोखा अनुपम संगम देखने को मिला शपथ ग्रहण के बाद!नवोदय नगर हरिद्वार

 


स संपादक शिवाकांत पाठक!

( चेयरमैन प्रतिनिधि (, सभासद दीपक नौटियाल का चेयरमैन से अद्भुत मिलन )

लंका दहन कर लौटे हनुमान से राम कुशल पूछते हैँ,, कहते हैँ निशाचरों की नगरी में तुम अकेले ही जाकर रावण के पुत्र का बध कर लंका दहन करने में कैसे सफल हुये हनुमान,,? हनुमान बोले,,, सो सब तौ प्रताप राधुराई,,, मैं तो ठहरा बन्दर एक डाल से दूसरी डाल पर उछलने के आलावा क्या कर सकता हूँ,, राघव जिस पर आपकी कृपा हो उसे कुछ भी असम्भव नहीं हैँ,, कह कर चरणों में गिर पड़े,,, राम जी मुस्करा कर बोले तुम्हारे उपकारों के ऋण से मैं कभी मुक्त नहीं हो सकता,,

प्रेम  ईश्वर की एक अनूठी अनुपम रचना है जिसमें समाप्त होने वाली कोई चीज है ही नहीं प्रेम तो वह संगम है जिसमें गंगा, यमुना,सरस्वती तीनो का समागम होता है,, कीर्ति, यश, वैभव तीनो ही विलुप्त हो जाते हैँ,, दीखते ही नहीं,, बस वैसे ही दो निस्वार्थ प्रेमी कुछ ऐसे मिले जैसे सुबह और शाम का अद्भुत मिलन हो रहा हो सभी लोग स्तब्ध होकर देख रहे थे जैसे सूरदास की भक्ति में कृष्ण समाहित होने के वावजूद दीखते नहीं हैँ,, ठीक वैसे ही वर्षो की यात्रा करने के बाद एक नदी सागर से मिल रही है,, समर्पण कर रही है अपने अस्तित्व का विलय कर रही है सागर में,,

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