परमेश्वर संपूर्ण जगत् में व्याप्त है,,!पंडित बलराम शुक्ल जी नवोदय नगर, हरिद्वार,!
स संपादक शिवाकांत पाठक,,
, जिनका सतत् स्मरण करते हुए तथा जिनकी पूजा के लिए ही समस्त कर्म करनी चाहिए, वह कैसे हैं, इस जिज्ञासा पर,
ऋषि कहते हैं---
अनेजदेकं मनसा जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन पूर्वमर्षत् ।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ।।
व्याख्या--- यह सर्व अंतर्यामी, सर्वशक्तिमान-परमेश्वर अचल और एक हैं, तथापि मन से भी अधिक तीव्र वेग युक्त हैं । जहाँ तक मन की गति है, वे उससे भी कहीं आगे, पहले से ही विद्यमान हैं । मन तो वहां तक पहुंच ही नहीं पाता । वे सबके आदि और ज्ञान स्वरूप हैं अथवा सबके आदि होने के कारण सबको पहले से ही जानते हैं । पर उनको देवता तथा महर्षिगण भी पूर्ण रूप से नहीं जान सकते ।
गीता १० ।२ ।
जितने भी तीव्र वेग युक्त बुद्धि, मन और इंद्रियों अथवा वायु आदि देवता हैं, अपनी शक्ति भर परमेश्वर के अनुसंधान में सदा दौड़ लगाते रहते हैं; परंतु परमेश्वर नित्य अचल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं । वे सब वहां तक पहुंच ही नहीं पाते ।
असीम की सीमा का पता ससीम को कैसे लग सकता है । बल्कि वायु आदि देवताओं में जो शक्ति है, जिसके द्वारा भी जलवर्षण, प्रकाशन, प्राणीप्राणधारण आदि कर्म करने में समर्थ होते हैं, वह इन अचिंत्यशक्ति परमेश्वरकी शक्तिका एक अंश मात्र ही है । उनका सहयोग मिले बिना यह सब कुछ भी नहीं कर सकते ।

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