फेल होने पर खुदकुशी कर लेने की बढ़ी रफ्तार, क्या सिर्फ परीक्षा पास करना ही है जिंदगी का लक्ष्य,,,?
स संपादक शिवाकांत पाठक,,,
( कहीं आत्म हत्या का पाठ तो नहीं है जिम्मेदार,,कौन देगा जबाब शिक्षक,, संरक्षक,, या फिर,,,???? )
एक खबर अभी सामने आई कि रूड़की की एक छात्रा ने फेल होने पर गंग नहर में छलांग लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त करने हेतु प्रयास किया,, एक युवक द्वारा उसे बचा लिया गया वरना उसके जीवन का आज अंत सुनिश्चित था,,,
मैं,, स शिवाकांत पाठक सभी बच्चों और उनके परिजनों से हाँथ जोड़ कर अपील करता हूँ की इस तरह की घटनाये देश के भविष्य के लिये बेहद दुःखद हैँ,, अभिभावक गण संयम से काम लें और बच्चों को असफल होने पर उन्हें डाटने की वजाय उन्हें सांत्वना दे साहस दें,, निगेटिविटी से उन्हें बचाएं,, आप सोचिये कि गमले में जो पेड़ आपने खुद लगाया है यदि वह सूख जाये तो जिम्मेदार कौन होगा पेड़ या आप,, बच्चों से अनुरोध है कि वे सोचे कि भारतीय संस्कृति में जो राजा कई बार हारे उन्होने आत्म हत्या नहीं की वल्कि तैयारी की और एक दिन वे सफल हुए,,,
स्कूल या उच्च शिक्षा का वह कैसा पाठ्यक्रम है जो बच्चों के भीतर हौसले को मजबूत करने के बजाय उन्हें भावनात्मक स्तर पर बेहद कमजोर बना रहे हैँ।
कोटा ही नहीं देश के तमाम प्रदेशो से फेल छात्रों से जुड़े आत्महत्या के मामलों के बीच अब उनके लापता होने की खबरें सामने हैं।
यह समस्या अब एक व्यापक चिंता का रूप ले चुकी है। दसवीं या बारहवीं की परीक्षा में भी फेल होने या नंबर कम आने के तनाव में कई विद्यार्थियों के खुदकुशी कर लेने की खबरें हर वर्ष आ जाती हैं। चिंता की बात यह है कि अब ये कुछ घटनाएं मात्र न रह कर एक व्यापक समस्या की शक्ल लेती जा रही हैं। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि छात्र-छात्राओं की आत्महत्या की दर कुल आत्महत्या की दर से तो ज्यादा है ही, लेकिन अब यह जनसंख्या में इजाफे की दर को भी पार गई है।
NCRB की रिपोर्ट में बताई गई बातें बनीं गंभीर चिंता का विषय
गौरतलब है कि आइसी-3 सम्मेलन में बुधवार को राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के आधार पर ‘छात्र आत्महत्या : भारत में फैलती महामारी’ शीर्षक से जारी रपट में यह बताया गया है कि आत्महत्या की कुल घटनाओं में प्रति वर्ष जहां दो फीसद की बढ़ोतरी हुई है, वहीं विद्यार्थियों के बीच जान दे देने की मामलों में चार फीसद यानी राष्ट्रीय औसत से दोगुनी की वृद्धि हुई है। यह स्थिति तब है, जब इस बात की संभावना है कि विद्यार्थियों के आत्महत्या के मामलों में ‘कम रिपोर्टिंग’ हुई हो यह बेहद सोचनीय विषय है।
अगर विद्यार्थियों के बीच आत्महत्या की बढ़ती यह प्रवृत्ति खुदकुशी की कुल घटनाओं के मुकाबले और यहां तक कि आबादी में बढ़ोतरी की रफ्तार से भी तेज है तो यह सोचने की जरूरत है कि देश में शिक्षा का यह कैसा स्वरूप बन गया है, जिसमें पढ़ाई-लिखाई करने की उम्र में बच्चे जीवन से हार मान रहे हैं स्पष्ट है की बच्चे मानसिक बीमारी से त्रस्त होते जा रहे हैँ,,, स्कूल या उच्च शिक्षा का वह कैसा पाठ्यक्रम है जो बच्चों के भीतर हौसले को मजबूत करने के बजाय उन्हें भावनात्मक स्तर पर बेहद कमजोर बना देता है।

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