क्या आप भी चाहते है ग़रीबी सदा के लिये समाप्त हो जाये,, तो पढ़िए वैदिक उपाय,, ध्रुव सत्य,!

 




स संपादक शिवाकांत पाठक,,

जिस दिन उसने कुछ नही मांगा — 

उसी दिन कृष्ण ने सब कुछ दे दिया…,,,

अमावस्या की रात थी।

और उसकी ज़िंदगी की भी।


घर में आटा नही था,

मां की दवा दो हफ्ते से अधूरी,

पिता की आंखें भीतर धंसी हुई,

और किराया चुकाने का चेहरा 

भी अब न रहा।


मंदिर वो रोज़ जाता था —

पर अब कृष्ण से आंखें 

मिलाना भी छोड़ चुका था।


उस दिन…

उसने निश्चय किया:


"आज कुछ नही मांगूंगा।

बस बैठूंगा तेरे सामने, कृष्ण —

जैसे टूटा हुआ वाद्य तेरे 

चरणों में पड़ा हो…"


उसके पास चढ़ाने को 

कुछ भी नही था।

दीया, फूल, माला — कुछ नही।


मंदिर की सीढ़ियों पर

तुलसी का एक टूटा पत्ता पड़ा था।


उसने उसे उठाया।

मंदिर में रखे छोटे से लोटे में 

जल भरकर

उस पत्ते को उसमें डाला —

और कृष्ण के चरणों में 

रख दिया।


"प्रभु,

आज यही है मेरी सेवा।

इसे स्वीकार कर लो।

मुझे कुछ भी नही चाहिए…"


फिर वो वहीं बैठा रहा…

और रोते-रोते वहीं सो गया।


रात के तीसरे पहर,

किसी ने उसके 

कंधे को झंझोड़ा।

पर वहां कोई नहीं था।


उसका गला सूख रहा था…

और उसके सामने वही 

जलपात्र रखा था।


तुलसी का पत्ता 

अब जल में डूब गया था।

जैसे कृष्ण ने मौन में 

स्वीकार कर लिया हो।


उसने कांपते हाथों से 

जल पी लिया —

न मंत्र, न याचना —

बस प्रेम और प्यास।


सुबह कुछ नही बदला।

वही संघर्ष, वही भूख, 

वही अपमान।

पर उसके भीतर पहली बार

एक गहराई से उठती शांति थी।


“कुछ तो बदला है… शायद मैं 

नही नही,

मेरे भीतर कोई मौन हो गया है।”

वर्षों बाद — 

वृंदावन में उस मौन की गूंज


सालों बीत गए।


अब वो भिखारी नही, निर्माता था।

जिस फैक्ट्री में कभी मजदूर था —

अब वो उसी का मालिक था।

और ऐसी ही चार और फैक्ट्री अब

उसके बेटे और बेटी चला रहे थे।


वो रेशम के वस्त्र पहने था,

सोने-हीरे की अंगूठियाँ 

उसकी हर उंगली में चमक रही थी,

पर उसकी आंखों में अब भी

वही मंदिर का जल कांप रहा था।


वो वृंदावन पहुंचा —

अपनी नई गाड़ी से।

पर जैसे ही मंदिर दिखा —

जूते उतार दिए,

और माथा 

उसी ज़मीन पर टिका दिया।


भागवत कथा चल रही थी।

गुरुजी बोले:


"एक दुर्लभ उपाय है —

अमावस्या की रात,

तांबे का पात्र, जल, 

तुलसी, मौन,

और मंत्र —

‘गोविंदं प्रियं भावयामि’…"


वो कांप गया।

उसकी आँखों से 

आंसू बह निकले।

वो उपाय…

जो उसने बरसों पहले

अनजाने में कर दिया था —

मौन में, प्रेम में, टूटकर।


“मैंने मांगा नही था —

तभी शायद कृष्ण ने दिया था…”


शुद्ध, स्पष्ट, 

धर्मसम्मत दुर्लभ उपाय:


शास्त्र कहता है:

अमावस्या की रात,

घर की उत्तर दिशा में,

एक तांबे के पात्र में 

स्वच्छ जल भरें।


नोट: अमावस्या को 

तुलसी तोड़ना वर्जित है।

अतः एक दिन पूर्व 

तुलसी-पत्र तोड़कर रख लें

या तुलसी के पौधे के नीचे 

गिरे पवित्र पत्र का प्रयोग करें।


अब उस पात्र में तुलसी डालें

और उसके पास मौन में बैठें।


फिर 11 बार मन ही मन जपें:


‘गोविंदं प्रियं भावयामि’

(भावार्थ: “हे गोविंद, 

मैं तुझे चाहता हूँ — 

पाने के लिए नही,

तुझे जीने के लिए”)


कुछ भी मांगना नहीं है।

न धन, न समाधान।

क्योंकि जब कुछ 

नही मांगा जाता —

तब सब कुछ 

मिलने लगता है।


जप पूर्ण होते ही —

उसी जल को मौन में, 

श्रद्धा से पी लें।


यदि यह साधना 

तीन लगातार अमावस्या 

की रातों को की जाए —

तो केवल दरिद्रता नही,

भीतर की रिक्तता भी 

समाप्त होती है।

और जहां आत्मा समृद्ध 

होती है —

वहां कृपा बिना आहट 

के उतर आती है।


"कृष्ण को मांगने से नहीं…

कृष्ण को जीने से कृपा आती है।

और जब आप मौन होते है…

तब कृष्ण आपके जीवन की 

आवाज़ बन जाते हैं।"


क्या आपने भी कभी 

कृष्ण से इतना मांगा …

कि 

एक दिन थककर बस चुप हो गए?


तो शायद ये उपाय 

उसी मौन का उत्तर है…


अगर ये कथा आपकी 

आत्मा से टकराई हो,

तो इसे सुरक्षित कर लें।


अगली अमावस्या की रात 

इसे फिर पढ़िए।

क्योंकि कभी-कभी उपाय नही …

सिर्फ़ मौन ही कृपा होता है।


उपरोक्त उपाय एवं कथा में 

प्रयुक्त सभी तत्व वैदिक, 

पौराणिक एवं भक्ति-सूत्रों पर 

आधारित हैं। यह अनुभवजन्य 

साधना, धर्मशास्त्रों की मर्यादा 

में रहते हुए आधुनिक भक्त के 

लिए सरल और आत्मिक रूप 

से प्रभावकारी है।


अध्यात्म,,,

वी एस इंडिया न्यूज़ दैनिक विचार सूचक समाचार पत्र,,


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