समाज के बदलते परिवेश में कुछ अलग करने की कामना, ही राष्ट्र धर्म,!अनूप भारद्वाज एडवोकेट,!
स संपादक शिवाकांत पाठक,,
तनाव और बहुत से शौक ऐसे कारण है जो नशे के प्रचलन को बढ़ा रहे हैं। इसका शिकार हमारी युवा पीढ़ी हो रही है। नशा करना युवाओं के लिए एक फैशन की तरह है जो प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट से यह पता चलता है कि भारत में चार लाख लोग कई तरह के नशे करते हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में दो लाख से ज्यादा लोग नशा करने की वजह से मर जाते हैं। बेरोजगारी भी नशे का बहुत बड़ा कारण है। इतनी ज्यादा जनसंख्या होने के कारण भारत में बेरोजगार युवा निराश होकर नशा करने लग जाते हैं जिसके कारण वह अपने घरों में पैसे चुराकर भी नशा करते है। इससे उन युवाओं के परिवारों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। व्यापारी नशीले पदार्थ बेचते हैं और इन मासूमों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करते है। परिणामस्वरूप नशे की लत में डूबे हुए लोगों के परिवारों को बहुत कुछ खोना पड़ता है। साथ ही साथ देश का भी नुकसान होता है। जिस वक्त युवाओं की पढ़ने की उम्र होती है, वह नशे की वजह से अपनी जिंदगी तबाह कर रहे होते हैं। नशा एक लत के साथ-साथ व्यापार का केन्द्र भी बनता जा रहा है। नशे की रोकथाम के प्रति सरकार का लापरवाह रवैया इसके चलन को बढ़ा रहा है। शराब की बोतल और सिगरेट की डिब्बी पर एक तरफ दी गई छोटी सी चेतावनी- "शराब या सिगरेट पीना सेहत के लिए हानिकारक है" सिर्फ एक औपचारिकता भर रह गई है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि सरकार को इससे अधिकतम लाभ प्राप्त हो रहा है। नशे के प्रति लोगों को जागरुक करना पड़ेगा, जिससे लोग इसे इस्तेमाल न करें। इस पर रोक लगने के बाद ही भारत आगे बढ़ पाएगा।

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