जब नेतागीरी समाज सेवा है तो एक नहीं कई पेंशन क्यों,,?

 


( जब विदेशो में जमा धन पता किया जा सकता है तो आय से अधिक संपत्ति की जाँच भी ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक की क्यों नहीं,,? )


जनता के मतानुसार चुने गये नेता जीतने के बाद मनमानी की सारी हदें पार करते हुए देखे जाते हैँ,, महगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर इनकी चुप्पी तमाम सवाल बन कर आम जनमानस के अंत: करण को झाझकोर कर रख देती है,, समस्याओ के चक्र व्यूह में फंसी जनता खुद असहाय समझ कर न्याय की उम्मीद के साथ अधिकारियो के चक्कर काटती रहती है,, और समाधान सिर्फ कागजी खानापूरी की शोभायात्रा बन जाता है क्यों,,,?,,नेता अपनी पेंशन के नियम खुद बनाते हैं, जो कानूनन मान्य है। 

नेताओं को पेंशन मिलने और सरकारी कर्मचारियों के लिए ओपीएस (पुरानी पेंशन योजना) बंद होने का मुद्दा अत्यधिक विवादित है।  इसके विपरीत, 2004 के बाद नियुक्त सरकारी कर्मचारियों के लिए एनपीएस (नई पेंशन योजना) लागू की गई है, जो बाज़ार पर आधारित है। नेताओं को यह विशेष पेंशन सुविधा सामाजिक सेवा के नाम पर मिलती है, जबकि कर्मचारी के लिए यह सेवा के बदले मिलने वाला लाभ माना जाता है। 


नेता और पेंशन 👉 नेताओं को, चाहे वे 30 दिनों के लिए ही जेल गए हों या कम समय के लिए ही चुने गए हों, कई बार पेंशन और विशेषाधिकार मिलते हैं।

कर्मचारी और पेंशन (ओपीएस vs एनपीएस)👉1 जनवरी 2004 से सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना (OPS) बंद कर दी गई है। अब उन्हें नई पेंशन योजना (NPS) के तहत पैसा मिलता है जो बाज़ार के जोखिम पर निर्भर है।

विवाद👉जनता यह सवाल उठाती है कि यदि राजनीति सेवा है, तो नेताओं को पेंशन की क्या आवश्यकता है, जबकि उम्र भर सेवा करने वाले कर्मचारियों को पुरानी पेंशन से वंचित रखा गया है।

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