मुझे मत जगाओ सोने दो भाई,रावण का कुम्भकर्ण को जगाना,!
इतिहास में यदि क़ोई आराम कर रहा है तो उसमें खलल तभी डाला गया जब क़ोई स्वार्थ हुआ क़ोई कारण हुआ,, वरना सुख समृद्ध का उपभोग तो प्रत्येक व्यक्ति या संगठन स्वयं करता है, जैसे रावण जब राज्य सुख भोगता रहा बड़े बड़े देवताओ पर विजय प्राप्त की तब कुम्भकर्ण को नहीं जगाया,, जब जगत जननी माँ जानकी का अपहरण किया तब नहीं जगाया,, जब की एक बार भाई के नाते मन्त्रणा तो करना चाहिए कि यह कार्य उचित है या अनुचित,,
लेकिन जब युद्ध भूमि में मेघनाथ जैसा पराक्रम शाली योद्धा धराशायी हो गया तब खुद को अकेला महसूस करते हुए कुम्भकर्ण को जगाने का प्रयास करने लगा,,
श्री रामचरित मानस में देखिये वृत्तांत,,, मेघनाथ की मृत्यु का समाचार सुनने के बाद,
चौपाई :
* यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ॥
ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा॥3॥
भावार्थ:- यह समाचार जब रावण ने सुना, तब उसने अत्यंत विषाद से बार-बार सिर पीटा। वह व्याकुल होकर कुंभकर्ण के पास गया और बहुत से उपाय करके उसने उसको जगाया॥3॥
* जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा॥
कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई॥4॥
भावार्थ:- कुंभकर्ण जगा (उठ बैठा) वह कैसा दिखाई देता है मानो स्वयं काल ही शरीर धारण करके बैठा हो। कुंभकर्ण ने पूछा- हे भाई! कहो तो, तुम्हारे मुख सूख क्यों रहे हैं?॥4॥
* कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी॥
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे॥5॥
भावार्थ:-उस अभिमानी (रावण) ने उससे जिस प्रकार से वह सीता को हर लाया था (तब से अब तक की) सारी कथा कही। (फिर कहा-) हे तात! वानरों ने सब राक्षस मार डाले। बड़े-बड़े योद्धाओं का भी संहार कर डाला॥5॥
* दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी॥
अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा॥6॥
भावार्थ:-दुर्मुख, देवशत्रु (देवान्तक), मनुष्य भक्षक (नरान्तक), भारी योद्धा अतिकाय और अकम्पन तथा महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमि में मारे गए॥6॥
दोहा :
* सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान॥62॥
भावार्थ:- तब रावण के वचन सुनकर कुंभकर्ण बिलखकर (दुःखी होकर) बोला- अरे मूर्ख! जगज्जननी जानकी को हर लाकर अब कल्याण चाहता है?॥62॥

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