बम-या बंदूको से नहीं भूख तो दो रोटी से मिटेगी सबसे बड़ा हथियार भूख !
( आज की दुनिया मिसाइलों, परमाणु बमों और अत्याधुनिक हथियारों से भरी है,
लेकिन भूख के सामने ये सब खिलौने बन जाते हैं। )
स संपादक शिवाकांत पाठक,,
एक बार अमेरिका राष्ट्रपति रहे जॉर्ज बुश ने वैश्विक मंच पर कहा था, “दुनिया को चलाने वाला सबसे बड़ा हथियार बम-बंदूक नहीं, पेट की आग है।” दो वक्त की रोटी न मिलने पर ख़त्म हो जाएगी मानवी दुनियां,,!
यह पंक्ति सुनने में साधारण लगती है, लेकिन इसके भीतर छिपा सत्य बहुत गहरा और डरावना है।
भूखा इंसान बम नहीं माँगता,
वह सिर्फ रोटी माँगता है। इसके लिए खुद को किसी के भी हवाले कर देता है. आज इस धरती पर अरबों लोग सांस ले रहे हैं। हर साँस के साथ एक सवाल जुड़ा है—आज क्या खाएँगे?
जिस ग्रह को हम “धरती माँ” कहते हैं, उसका अधिकांश हिस्सा नीले पानी से ढका है—
सुंदर, विशाल, लेकिन खेती के लिए बेकार।
जो थोड़ी-सी ज़मीन बचती है, वह कहीं रेगिस्तान बन चुकी है, कहीं ऊँचे पहाड़ों में कैद है,
कहीं ईंट कंक्रीट की इमारतों और चौड़ी सड़कों के नीचे दबती जा रही है। यानी जिस ज़मीन पर अन्न उग सकता है, वह हर दिन कम होती जा रही है, और खाने वाले हर दिन बढ़ते जा रहे हैं।
अब ज़रा भारत की ओर नज़र डालिए। देश जहाँ जनसंख्या भी ज़्यादा है, ज़मीन भी सीमित है,
संसाधन भी सीमित हैं—फिर भी इसी मिट्टी से दुनिया के सबसे ज़्यादा पेट भरने वाला अन्न निकलता है।
तो सवाल बहुत सीधा है, लेकिन बहुत तीखा भी—
जब अन्न उपजाने वाली ज़मीन पहले ही कम है, तो उसे उद्योगों, मुनाफ़े और कॉर्पोरेट लालच के हवाले करने की इतनी हड़बड़ी क्यों? क्या हम मशीनों का पेट भरने के लिए इंसानों की थाली खाली करना चाहते हैं?
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम विकास और विनाश के फर्क को समझें। हम यह सोचें कि जो ज़मीन आज छीनी जा रही है, वही ज़मीन कल हमारी आने वाली पीढ़ियों की थाली थी।
याद रखिए—देश की असली ताक़त हथियारों में नहीं, बल्कि उस रोटी में होती है जो हर नागरिक तक पहुँचे। अगर खेत बचे रहेंगे, तो भविष्य बचेगा।





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