बुरे कर्मों का भय ले जाता है लोगों को गंगा की ओर लेकिन! स. संपादक शिवाकांत पाठक!
यहां पर एक बात आपको बता देना चाहता हूं कि रामायण हमारे सभी वेद शास्त्रों का सार है जिसमें गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज लिखते हैं प्रेरणा हनुमान जी देते हैं राम भक्त हनुमान जी जो बताते हैं वे वही लिखते हैं, तो क्या लिखा जानते हैं आप ? नहीं कुछ पढ़ना समझना विचार करना आप सभी ने सीखा ही नहीं गोस्वामी तुलसीदास जी महराज लिखते हैं कि, जो जस करै सो तस फल चाखा, कर्म प्रधान विश्व रच राखा!!
कर्म प्रधान है मुख्य है बुरे कर्म करके आप बच नहीं सकते यदि अपने किसी तरह से देश, समाज, परिवार, मित्र या किसी भी व्यक्ति के साथ गलत किया है तो उसका फल आपको भोगना ही पड़ेगा , यहां पर फिर एक बार बता दें कि की यहां फिर रामचरित मानस में गोस्वामी जी लिखते हैं कि,, काया से जो पातक होई बिन भोगे छूटे नहि कोई !! कोई मतलब आप खुद समझ ले कि यहां इस प्रथ्वी पर कोई भी कितने भी बड़े पद पर क्यों ना हो, कितना भी अमीर क्यों न हो आडंबर व चालाकियां करने पर भी बच नहीं सकता ! केवल भक्ति रूपी अग्नि ही पापों को भस्म करने की शक्ति रखती हैं लेकिन भक्ति मार्ग बहुत कठिन है प्रभु राम स्वयं कहते हैं
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥ समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥3॥
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥ समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥3॥ भावार्थ:-इन सबके ममत्व रूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है। (सारे सांसारिक संबंधों का केंद्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है॥3॥ साथ ही किसके पाप समाप्त हो सकते हैं इसके लिए भी प्रभु राम स्वयं कहते हैंकोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥1॥
भावार्थ
जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या लगी हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं॥1॥
लेकिन हैं भगवान के सन्मुख होते ही कब है धन कमाने की लालशा, सम्मान पाने की इच्छा आदि हमको माया के दल दल में फसाती जाती है !
हम अंतिम समय में सोचते हैं कि वास्तव में जो भी कमाया वह तो हमारे साथ जा ही नहीं सकता जो साथ जा रहा है वह केवल बुरे कर्म हैं परिणाम स्वरूप हमको फल भोगने फिर इसी दुनियां में आना पड़ता है लेकिन अपाहिज बन कर लंगड़े लूले बनकर , बीमार बनकर, जानवर बनकर तो फिर हम खुद ही जिम्मेदार हैं हर कर्मों के और फल भोगने के!
संसार में दो तरह के लोग हैं, एक वे जो पाप से बचना चाहते हैं। दूसरे वे जो पाप के फल से बचना चाहते हैं। ऐसे लोग छल-कपट, द्वेषपूर्ण व्यवहार करने के पश्चात दान-पुण्य, तथाकथित धार्मिक अनुष्ठान में लग जाते हैं। सालभर पाप करो और एक दिन गंगा में जाकर स्नान करके पाप को बहा आओ, ऐसा नहीं होता। कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। उक्त विचार वैदिक सत्संग समिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम में आचार्य डॉ.अजय आर्य ने व्यक्त किया।
उपासना का अर्थ परमात्मा के पास बैठना
आचार्य ने कहा कि आप जो बांटोगे वही आपको कई गुणा वापस मिलता है, स्वर्ग कहीं और नहीं, यहीं है। आप सबसे प्रेम करने लगो तो घर में स्वर्ग हो जाएगा। ईर्ष्या द्वेष, लोभ, क्रोध ये सभी नरक के द्वार है। उपासना का अर्थ परमात्मा के पास बैठना और उपवास का अर्थ परमात्मा के पास बस जाना है। जिस तरह अत्यंत ठंड से कांप रहा व्यक्ति अग्नि के पास जाकर राहत महसूस करता है, वैसे ही परमात्मा की भक्ति से रोग, शोक और संताप दूर हो जाते हैं। उपवास और निराहार रहने में अंतर है। निराहार रहने से बीमारी दूर होती है लेकिन हमेशा निराहार न रहें वरना नुकसान होता है।





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