समस्याओं से लड़ने को सभी देशवासियों एक हो जाओ! रिजवान खान (संयुक्त सचिव किसान कांग्रेस) उत्तराखंड!

 


स. संपादक शिवाकांत पाठक!


    1989 तक कुछ अपवाद छोड़ दें, तो जाति-धर्म के आधार पर मतदान नहीं होता था। कहीं कामगारों का झंडा बुलंद होता था, तो कहीं किसानों-मजदूरों का।  मतदाता ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया, पिछड़े और दलितों में नहीं बंटे थे। 

         दूसरे संप्रदाय के आयोजनों को महामारी फैलाने वाला बता दिया जाता है। जिनके महल इन अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की वफादारी और काम के बूते खड़े है _मानवता की हत्या कर राम राज्य बनाने की बातें हो रही है।_    


     महामारी दिन प्रतिदिन पांव पसार रही है, जिस पर सभी खामोश हैं।ऐसे वक्त में भी हमारे राजनीतिज्ञों में सत्ता की भूख सबसे ज्यादा है। देश-प्रदेश को बेहाल छोड़कर सभी नफरत फैलाकर, जीत हासिल करने की गोट खेल रहे हैं। देश के अस्पतालों में मरीजों के लिए न बेड हैं, न आक्सीजन और न दवायें। सरकार बयानवीर बनी दावे ठोकने में लगी है।_

         सच तो यह है कि सिर्फ विश्व मुद्राकोष, एशियन विकास बैंक और विश्व स्वास्थ संगठन ने ही भारत सरकार को कोरोना से लड़ने का ढांचा तैयार करने के लिए करीब 54 हजार करोड़ रुपये दिये हैं। देश-विदेश की कंपनियों और लोगों ने भी पीएम केयर फंड में हजारों करोड़ रुपये दिये हैं। 


       _केंद्र सरकार ने अपने स्वास्थ बजट में सिर्फ 69 हजार करोड़ रुपये रखे हैं। इस धन से दिल्ली एम्स जैसे कई अस्पताल बन सकते थे मगर साल भर में भी कुछ नहीं हुआ। दवाओं के शोध के लिए सीडीआरआई और नाइपर जैसे संस्थानों को कोई मदद नहीं मिली। राज्यों, जिलों, तहसीलों और प्राथमिक स्तर के अस्पतालों की दशा सुधारने पर कोई कदम नहीं उठाया गया।_

         सांकेतिक फीस लेकर अच्छे योग्य डॉक्टर तैयार करने के लिए मेडिकल कालेजों में कोई व्यवस्था नहीं की गई। यही कारण है कि देश की चिकित्सा सेवा न सिर्फ संसाधनों के संकट से जूझ रही है बल्कि समर्पित योग्य डॉक्टरों के अभाव में दम तोड़ रही है। वहीं, निजी क्षेत्र के अस्पताल दिन दूने रात चौगुणें फलफूल रहे हैं। उनका धंधा आठ लाख करोड़ रुपये से अधिक का है। 

       _इन सरकारी नीतियों के चलते ही हर अस्पताल में मानवता की हत्या हो रही है मगर सत्ता पर काबिज जनप्रतिनिधि ऐश फरमा रहे हैं।_

         खराब चिकित्सीय हालात के कारण मरते लोगों को देख भावुक हुए यूपी के कानून मंत्री ब्रजेश पाठक ने कड़ा पत्र लिखकर अपनी ही सरकार पर सवाल उठा दिये। 

  उनकी चिट्ठी से सोई सरकार हिली मगर मानवता के लिए नहीं बल्कि अपनी छवि बचाने के लिए।

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