( विचार प्रवाह)
संपादक शिवाकांत पाठक!
हरियाणा में विधानसभा चुनाव इसी साल होने हैं, अगले साल लोकसभा के आम चुनाव। जहां एक हजार वोट काबू में रखने वाला भी तगड़ा रुतबा रखता हो- वहां लाखों वोटों का दावेदार किस हैसियत का मालिक होगा, अलग से यह बताने की जरूरत नहीं है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा कोई ऐसा खेल खेलेगी कि गुरमीत राम रहीम सिंह खुलकर उसके पक्ष में आ जाए।
वैसे भी सुनारिया जेल के इस पत्रकार के सूत्र बताते हैं कि वहां उसे वीवीआइपी सुविधा हासिल है। केस सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। गुरमीत रिहाई चाहता है और पीड़ित विरोधी पक्ष भी बेहद मजबूती के साथ उसके खिलाफ खड़े हैं और केस लड़ने को हर वक्त तत्पर। गुरमीत राम रहीम सिंह की 33 महीने में ग्यारहवीं पेरोल इस बार क्या गुल खिलाती है, हफ्ते के भीतर ही पता चल जाएगा।
बेशक हरियाणा में उसकी पैरोल के खिलाफ कोई बड़ी आवाज फिलवक्त बुलंद न हुई हो लेकिन पंजाब में सर्वोच्च सिख धार्मिक संस्था श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी रघबीर सिंह ने गुरमीत राम रहीम सिंह को बार-बार पैरोल देने पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि डेरा प्रमुख दुष्कर्मी व कातिल है। एक तरफ तो राम रहीम को लगातार पैरोल दी जा रही है, दूसरी तरफ तीस वर्षों से जेलों में बंद सिखों को सजा पूरी होने के बाद भी रिहा नहीं किया जा रहा है।
ज्ञानी रघबीर सिंह ने कहा कि सोची-समझी रणनीति के तहत गुरमीत राम रहीम सिंह को पैरोल दी गई है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के प्रधान एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने भी राम रहीम को पैरोल देने पर गहरी आपत्ति जताई है और कहा है कि इससे लोकभावनाएं आहत हुईं हैं।
जानकारों का मानना है कि दोहरी उम्रकैद का कैदी तैंतीस बार जेल से बाहर पैरोल तथा फरलो पर आया और बागपत गया। यूपी और हरियाणा के प्रशासन को उससे कोई शिकायत नहीं हुई यानी उसने कानून के किसी भी धारा का उल्लंघन नहीं किया।
यह दरअसल एक आधार तैयार करने की बड़ी कवायद है। ज्यादा न कहा जाए तो इशारों में इतना तो कर ही सकते हैं कि 2024 के आम लोकसभा चुनाव में वह अपनी पैरोल या फरलो सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा में काट सकता है। यह एक बहुत बड़ा और खतरनाक ‘खेल’ है; जिसमें सरकारी मशीनरी का हर पुर्जा अपनी-अपनी भूमिका निभाएगा। बहरहाल, खेल तो अभी भी चल रहा है! आने वाले दिनों में पूरा परिदृश्य एकदम साफ हो जाएगा.

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