मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के आदर्श का चरित्र चित्रण है रामलीला! नवोदय नगर हरिद्वार!

 


संपादक शिवाकांत पाठक !



नवोदय नगर में प्रभु राम भक्तो के विशेष प्रयास से उनके चरित्र चित्रण को आम जन मानस तक पहुंचाने हेतु श्री राम लीला का अयोजन किया जा रहा है जिसमें नवोदय नगर ही नहीं बल्कि संपूर्ण हरिद्वार के राम भक्तों का सहयोग प्राप्त हो रहा है,, नवोदय नगर के कर्मठ लगनशील कर्तव्यनिष्ठ लोग पुरी तरह से इस धार्मिक कार्य को पूरा करने में प्रयासरत हैं ,, आइए जानते हैं प्रभु राम के जन्म के कारण,,,



सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल।

कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड़॥120 ख॥

भावार्थ:-हे पार्वती! निर्मल रामचरितमानस की वह मंगलमयी कथा सुनो जिसे काकभुशुण्डि ने विस्तार से कहा और पक्षियों के राजा गरुड़जी ने सुना था॥120 (ख)॥

सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब।

सुनहु राम अवतार चरति परम सुंदर अनघ॥120 ग॥

भावार्थ:-वह श्रेष्ठ संवाद जिस प्रकार हुआ, वह मैं आगे कहूँगा। अभी तुम श्री रामचन्द्रजी के अवतार का परम सुंदर और पवित्र (पापनाशक) चरित्र सुनो॥120(ग)॥

 हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित।

मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु॥120 घ॥

भावार्थ:-श्री हरि के गुण, मान, कथा और रूप सभी अपार, अगणित और असीम हैं। फिर भी हे पार्वती! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कहता हूँ, तुम आदरपूर्वक सुनो॥120 (घ)॥


चौपाई :

सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए॥

हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥1॥

भावार्थ:-हे पार्वती! सुनो, वेद-शास्त्रों ने श्री हरि के सुंदर, विस्तृत और निर्मल चरित्रों का गान किया है। हरि का अवतार जिस कारण से होता है, वह कारण 'बस यही है' ऐसा नहीं कहा जा सकता (अनेकों कारण हो सकते हैं और ऐसे भी हो सकते हैं, जिन्हें कोई जान ही नहीं सकता)॥1॥

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी॥

तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥2॥

भावार्थ:-हे सयानी! सुनो, हमारा मत तो यह है कि बुद्धि, मन और वाणी से श्री रामचन्द्रजी की तर्कना नहीं की जा सकती। तथापि संत, मुनि, वेद और पुराण अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार जैसा कुछ कहते हैं॥2॥


 तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही॥

जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥3॥

भावार्थ:-और जैसा कुछ मेरी समझ में आता है, हे सुमुखि! वही कारण मैं तुमको सुनाता हूँ। जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं॥3॥

चौपाई :

 करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥4॥

भावार्थ:-और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गो, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं॥4॥


दोहा :

 असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।

जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥121॥

भावार्थ:-वे असुरों को मारकर देवताओं को स्थापित करते हैं, अपने (श्वास रूप) वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं और जगत में अपना निर्मल यश फैलाते हैं। श्री रामचन्द्रजी के अवतार का यह कारण है॥121॥

चौपाई :

 सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं॥

राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका॥1॥

भावार्थ:-उसी यश को गा-गाकर भक्तजन भवसागर से तर जाते हैं। कृपासागर भगवान भक्तों के हित के लिए शरीर धारण करते हैं। श्री रामचन्द्रजी के जन्म लेने के अनेक कारण हैं, जो एक से एक बढ़कर विचित्र हैं॥1॥


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