प्रोग्राम बनाने से ही प्रोग्रेस होता है म!श्रीवास्तव सहायक सूचना निदेशक!
देहरादून! स. संपादक शिवाकांत पाठक!
स्व चिन्तक बन कर स्वंय में परिवर्तन कर सकते है। परिवर्तन की स्टेज और परसेन्टेज को चेक करना है, चेकिंग के आधार पर हम जान सकते है कि हम स्वंय के प्रति कितना स्व चिन्तक बने है। किसी भी प्रकार के परिवर्तन के लिए हम प्लान बनाते रहते है और समय निश्चित करते रहते है। ऐसे ही स्व चिन्तक बन कर अपने को सम्पूर्ण बनने कि विधि के विषय में नये नये युक्तियाॅ सोचना चाहिए।
कुछ लोग प्लान अधिक बनाते है लेकिन रिजल्ट कम पाते है। इसलिए चेक करे कि हम उमंग उत्साह में आकर अपने लक्ष्य के प्रति कभी कभी अटेन्शन देते है अथवा समस्या आने पर हमारा अटेन्शन स्वत ही चला जाता है। लेकिन सफलता व कार्य की सम्पन्नता तब तक नही हो सकती जब हमारे परिवर्तन की स्पीड तीव्र नही होती है।
हमें स्वंय के प्रति स्वंय का ही प्लान बनना है। प्रोग्राम बनाने से ही प्रोग्रेस होता है। लौकिक रूप में इससे प्रोग्राम बना कर प्रोग्रेस करने से अल्प काल की उन्नति अवश्य हो जाती है लेकिन सदा काल की उन्नति का आधार है स्व चिन्तक बनना।
हमें चिन्तन करने के साथ ही अपने लक्ष्य के प्रति चिन्ता करनी चाहिए। यह चिन्ता सकारात्मक होती है, इसमें कार्य नही होने की चिन्ता नही होती है बल्कि कार्य को पूर्ण करने कि चिन्ता होती है। यह चिन्ता सुख स्वरूप चिन्ता होती है और अनके प्रकार के चिन्ताओं को मिटाने वाली चिन्ता होती है। जैसे सभी प्रकार के बन्धनों से छूटने के लिए हम एक शुभ बन्धन में बन्ध जाते है, भले ही इस बन्धन का नाम बन्धन हो लेकिन इसका स्वरूप निर्बन्धन का होता है।
इसके विपरीत वर्तमान समय में हमारे मन में संकल्प उठता है और चिन्तन चलता है लेकिन जैसा होना चाहिए वैसा नही होता है। यह होना चाहिए, यह करना चाहिए, ऐसे करें, यह सब चिन्तन का एक स्वरूप है। लेकिन सकारात्मक चिन्ता का स्वरूप सोचना, बोलना, चलना और करना एक समान होता है। पारलौकिक चिन्ता लौकिक चिन्ता से भिन्न होती है। जब तक हम स्वंय के प्रति विशेष विधि को नही अपनाते है तब तक पारलौकिक चिन्तन नही कर सकते है।
अभी तक की मुख्य समस्या बुद्धि में निश्चय का अभाव है। निश्चित न होने के कारण हम निश्चित नही रहते है। यदि प्लान बना कर इसे पूर्ण करने का समय निश्चित कर लें तो स्वंय के प्रति निश्चिंत रहना आसान हो जाता है। इसके लिए अपने उन्नति के प्रति समय निश्चित कर लेना चाहिए। स्वंय का स्वंय ही शिक्षक बन कर जब तक स्वंय को पारलौकिक बन्धन में नही बांध सकते है।
कार्य को टालना समय को गावना है। आने वाले दिनांे में समय और कम होता जायेगा, आगे चलकर स्वंय के प्रति विशेष समय और ही कम मिलेगा। जैसे आज कल के लोग कहते है कि पहले फिर भी समय मिल जाता था लेकिन अब तो वह भी समय नही मिलता है। इसलिए यदि हमने स्वयं के प्रति जो करना था वह नही किया तब असफल होना निश्चित है। प्रगति की निशानी है मेहनत कम सफलता अधिक। जितना निशाना समीप दिखाई देगा उतना नशा आटोमैेटिकली होगा। नशा अर्थात खुशी का अनुभव होना।

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